शनिवार, अक्तूबर 28

बायोप्सी टेस्ट (biopsy meaning in hindi)

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बायोप्सी क्या है? (biopsy test)

बायोप्सी (biopsy) एक मेडिकल टेस्ट है जिसका सैम्पल संग्रहण आमतौर पर एक सर्जन द्वारा किया जाता है और जाँच का कार्य लैब तकनीशियन और पैथोलॉजिस्ट द्वारा किया जाता हैं। इस प्रक्रिया में संभावित कैंसर की बीमारी की उपस्थिति या स्थिति का पता करने के लिए जांच के लिए नमूना कोशिकाओं या ऊतकों को निकालना और जांच को शामिल किया जाता है।

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बायोप्सी क्यों की जाती है?

बायोप्सी शब्द आमतौर पर कैंसर से जुड़ा शब्द है, लेकिन केवल इसलिए कि आपके डॉक्टर ने बायोप्सी की जांच का कहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि आपको कैंसर है।
अधिकांश कैंसर के डॉयग्नोस के लिए बायोप्सी ही एकमात्र तरीका है जो यह बताता है कि कैंसर हैं कि नहीं। सीटी स्कैन और एक्स-रे जैसे इमेजिंग टेस्ट उन क्षेत्रों की पहचान करने में केवल मदद कर सकते हैं, लेकिन वे कैंसरग्रस्त और गैर-कैंसरग्रस्त कोशिकाओं के बीच अंतर नहीं कर सकते हैं।

डॉक्टर बायोप्सी का उपयोग यह जांचने के लिए करते हैं कि आपके शरीर में कोई गांठ कैंसर के कारण हैं या अन्य कारणों से।
उदाहरण के लिए यदि किसी में कोई गांठ है तो एक इमेजिंग टेस्ट गांठ की पुष्टि करेगा, लेकिन बायोप्सी यह निर्धारित करने का एकमात्र तरीका है कि यह गांठ कैंसर युक्त है या नहीं।


बायोप्सी टेस्ट कैसे होता है?

बायोप्सी शरीर के किसी भी प्रभावित हिस्से से ली जा सकती है। ये बायोप्सी सैम्पल आमतौर पर एक सर्जन द्वारा लिया जाता हैं।
बायोप्सी के लिए मरीज के शरीर से प्रभावित स्थान से नीडल द्वारा कोशिकाओं को लिया जाता हैं जिसे FNAC टेस्ट कहा जाता हैं। इसकी एक स्लाइड बनाई जाती हैं और प्रोसेस के बाद स्टैंनिग की जाती हैं जिसे H & E स्टैनिंग कहा जाता हैं। इसके बाद स्लाइड को पैथोलॉजिस्ट द्वारा माइक्रोस्कोप में कोशिकाओं को चेक किया जाता हैं कि वे सामान्य कोशिकाएं हैं या केंसर सेल्स।

दूसरी ओर यदि कोई अंग प्रभावित हैं तो उसका कुछ भाग या कई बार सर्जरी में अंग ही निकाल दिया जाता हैं। उस अंग के कुछ भाग का उत्तक लिया जाता हैं और यह टिश्यू निम्नलिखित प्रक्रिया से गुजरता है।

टिश्यू प्रक्रिया के चरण (stage of tissue processing)
1. फिक्सेशन (FIXATION)
2. डिहाइड्रेशन (DEHYDRATION)
3. क्लीयरिंग (CLEARING)
4. इम्प्रेग्नेशन (IMPREGNATION)
5. एम्बेडिंग (EMBEDDING)
6.माइक्रोटॉमी (MICROTOMY or SECTIONING)
7.स्टैनिंग (STAINING)
8. माउंटिंग (MOUNTING)
9. माइक्रोस्कोपी (MICROSCOPY)

पैथोलॉजिस्ट द्वारा माइक्रोस्कोप में कोशिकाओं को चेक किया जाता हैं कि वे सामान्य कोशिकाएं हैं या केंसर सेल्स।


बायोप्सी की जांच कितने रुपए में होती है (Biopsy Test price) (biopsy test cost)

बायोप्सी टेस्ट की कीमत में एकरूपता नहीं पाई जाती हैं। विभिन्न सरकारी अस्पतालों में इसकी कीमत नाममात्र की होती हैं या निःशुल्क होती हैं। यदि यह जाँच किसी निजी लैब में होती हैं तो लैब दर लैब इसकी कीमत भिन्न भिन्न होती हैं। बायोप्सी की कीमत और समय टिश्यू और बायोप्सी के प्रकार के आधार पर भिन्न भिन्न होती हैं। औसतन बॉयोप्सी जाँच की कीमत 700 रुपये से 1500 रुपये होती हैं।


बायोप्सी की रिपोर्ट कितने दिन में आती है?

ब्लड टेस्ट के मुकाबले इसकी रिपोर्ट प्राप्ति में काफी समय लगता हैं। इसके लिए कुछ कारक जिम्मेदार है।
जैसे-
  • अस्पताल या क्लिनिक में मरीजों का वर्कलोड
  • लैब स्टाफ की उपलब्धता
  • बायोप्सी का प्रकार
  • अंग की संभावित बीमारी
क्योंकि गंभीर बीमारी होने पर रिपोर्ट को और आगे की जाँच की जाती हैं। अगर आपको कोई भी गंभीर बीमारी नहीं है तो बायोप्सी की रिपोर्ट जल्दी भी आ जाती हैं। हालांकि अगर सामान्य रूप से देखा जाए तो सामान्य बीमारी की बायोप्सी रिपोर्ट मिनिमम 4 से 7 दिन में आ जाती हैं और अगर कोई गंभीर बीमारी हैं तो 7 दिन से एक माह का समय लग सकता हैं।



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गुरुवार, अक्तूबर 12

प्लीहा या तिल्ली या स्प्लीन (spleen in hindi)

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प्लीहा (spleen in hindi)

हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम लिम्फेटिक सिस्टम का आवश्यक भाग है, जिसमे लिम्फ नलिकाएं, लिम्फ उत्तक और लिम्फ अंगों को शामिल किया गया है। लिम्फ नलिकाएं अंतरकोशिकीय द्रव (Interstitial fluid) या लिम्फ को पेरिफेरल उत्तक (peripheral tissue) से रक्त (blood) में परिवहन का कार्य करती है। लिम्फेटिक उत्तक (Lymphetic Tissue) और लिम्फेटिक अंगों में लिम्फोसाइट्स (lymphosytes) और श्वेत रक्त कोशिकाए (white blood cells) होती है।
प्राथमिक लिम्फेटिक अंगों में थायमस (Thymus) और अस्थि मज्जा (Bone Merrow) को शामिल किया जाता हैं। और द्वितीयक लिम्फेटिक अंगों में Spleen, Tonsils, Lymph nodes और Mucosa associated lymphoid tissue (MALT) को शामिल किया जाता है। इस भाग में हम प्रमुख लिम्फ अंग स्प्लीन के बारे में जानेंगे।




स्प्लीन क्या है? प्लीहा क्या है? (spleen meaning in hindi)

स्प्लीन (spleen) को कई नामों से जाना जाता हैं। जैसे प्लीहा या तिल्ली या स्प्लीन (spleen)
स्प्लीन (spleen) या प्लीहा या तिल्ली हमारे शरीर में 9वीं और 11वीं पसलियों के बीच पेट के ऊपरी बाएं चतुर्थांश में स्थित सबसे बड़ा लिम्फोइड अंग है।

स्प्लीन नार्मल साइज इन हिंदी (spleen normal size in Hindi)

स्प्लीन (spleen) की नॉर्मल साइज 12x7x3cm होती है। जब स्प्लीन के आकार में वृद्धि होती हैं तो मेडिकल भाषा में इसे स्प्लीनोमेगली (splenomegaly) कहा जाता हैं। स्प्लीन बढ़ने के कई कारण है। 
स्प्लीन एक इंट्रापेरिटोनियल अंग है जो स्प्लेनिक हिलम (hilum) को छोड़कर आंत के पेरिटोनियम से घिरा होता है। इसे ढकने वाला रेशेदार कैप्सूल संयोजी ऊतक से बना होता है। कैप्सूल ट्रैबेकुले (trabeculae) नामक अंग में छोटे विस्तार बनाता है।

स्प्लीन की सतह की विशेषताएं

स्प्लीन (spleen) के विपरीत छोर पर anterior and posterior छोर होते हैं। यहाँ दोनों ओर superior and inferior borders देखते हैं। यहां हमारे पास पार्श्व या डायाफ्रामिक सतह है जो उत्तल है जो बाएं हेमिडाफ्राम की समतलता में फिट होती है। और यहां हमारे पास औसत दर्जे की या आंत की सतह है।
आंत की सतह पर तीन छापें (impression) होती हैं -
वृक्क छाप (renal)
गैस्ट्रिक छाप (gastric) और
शूल छाप (colic)

हिलम स्प्लीन धमनी (spleen artery) और स्प्लीन शिरा (spleen vein) के पारित होने की अनुमति देता है। स्प्लीन (spleen) की प्राथमिक रक्त आपूर्ति स्प्लीन (spleen) धमनी से होती है। स्प्लेनिक धमनी शाखाएँ छोटी वाहिकाओं में विभाजित हो जाती हैं जिन्हें ट्रैब्युलर धमनियाँ कहा जाता है।

गैस्ट्रोस्प्लेनिक लिगामेंट हिलम को पेट की अधिक वक्रता से जोड़ता है और स्प्लेनोरेनल लिगामेंट हिलम को बाईं किडनी से जोड़ता है। स्प्लेनिक वाहिकाएं और अग्न्याशय की पूंछ स्प्लेनोरेनल लिगामेंट के भीतर होती हैं। गैस्ट्रोस प्लेनिक लिगामेंट और स्प्लेनोरेनल लिगामेंट के बीच छोटी थैली होती है। ध्यान दें कि स्प्लीन फ्रेनिकोकोलिक लिगामेंट सपोर्ट करती है, जो पेरिटोनियम फोल्ड है जो बृहदान्त्र से निकलती है।

स्प्लीन (spleen) में दो प्रकार के ऊतक होते हैं।
सफेद गूदा (white pulp) और 
लाल गूदा (red pulp)
सफेद गूदा स्प्लीन का मुख्य लिम्फोइड ऊतक है और इसमें रोम (follicles) लिम्फोसाइट्स और प्लाज्मा कोशिकाओं सहित लिम्फोइड तत्व होते हैं। लिम्फोसाइट्स जर्मिनल केंद्रों में निर्मित होते हैं, जो रोम के केंद्र में होते हैं। मैक्रोफेज (Macrophages) सफेद और लाल गूदे दोनों में रहते हैं। लाल गूदा तिल्ली की अधिकांश मात्रा का निर्माण करता है। इसमें लिम्फोसाइट्स और मैक्रोफेज सहित शिरापरक साइनस (venous sinuses) और लसीका कोशिकाओं की डोरियां (cords of lymphatic cells) शामिल होती हैं। जैसे ही रक्त स्प्लीन (spleen) के माध्यम से बहता है, लाल गूदे और सीमांत क्षेत्र के भीतर मैक्रोफेज और डेंड्राइटिक कोशिकाएं टी- और बी-कोशिकाओं में एंटीजन को पकड़ती हैं और पेश करती हैं, जिससे प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरू होती है। अब देखते हैं कि स्प्लीन का क्या काम है?

प्लीहा का कार्य (spleen function)

टी-कोशिकाएं एंटीजन-प्रस्तुत करने वाली कोशिकाओं (antigen-presenting cells) द्वारा प्रस्तुत विशिष्ट एंटीजन को पहचानती हैं। यह टी-कोशिकाओं के सक्रियण और प्रसार को ट्रिगर करता है, जिससे प्रभावकारी टी-कोशिकाओं में उनका विभेदन होता है। ये प्रभावकारी टी-कोशिकाएं अन्य प्रतिरक्षा कोशिकाओं के कार्यों को निर्देशित करके या सीधे हमला करके प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं का समन्वय करती हैं। बी-कोशिकाएं प्लाज्मा कोशिकाओं में विभेदित होती हैं, जो एंटीबॉडी का उत्पादन और विमोचन (release) करती हैं। एंटीबॉडीज़ एंटीजन से जुड़ते हैं और उन्हें आपके शरीर से निकालने में मदद करते हैं। जिन व्यक्तियों में स्प्लीन (spleen) कार्यशील नहीं है उनमें संक्रमण का खतरा अधिक होता है।

स्प्लीन (spleen) सबसे बड़ा लिम्फोइड अंग और एकमात्र लिम्फोइड अंग है जो मुख्य रूप से लसीका द्रव (lymphatic fluid) के बजाय रक्त को फ़िल्टर करता है। जैसे ही रक्त स्प्लीन (spleen) से गुजरता है, स्प्लीन (spleen) डोरियों के भीतर जालीदार फाइबर (reticular fibers) और मैक्रोफेज सक्रिय रूप से क्षतिग्रस्त, पुरानी या असामान्य लाल रक्त कोशिकाओं, सेलुलर मलबे और विदेशी कणों को परिसंचरण से हटा देते हैं। यह प्रक्रिया स्वस्थ आरबीसी के रखरखाव को सुनिश्चित करती है और असामान्य या क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के संचलन को रोकती है।

इसके अतिरिक्त स्प्लीन (spleen) का लाल गूदा प्लेटलेट्स और लाल रक्त कोशिकाओं के लिए एक भंडार के रूप में कार्य करता है, जो उन्हें बढ़ी हुई मांग के समय, जैसे कि रक्तस्राव या चोट के मामलों में, थक्का निर्माण और हिमोस्टेसिस में सहायता के लिए रक्त परिसंचरण में छोड़ता है।

स्प्लीन (spleen) की वाहिका की दीवारों में चिकनी मांसपेशियों का संकुचन, सहानुभूति तंत्रिका तंत्र (sympathetic nervous system) संकेतों द्वारा सुगम, संग्रहीत एरिथ्रोसाइट्स को रक्तप्रवाह में वापस भेजता है एरिथ्रोसाइट होमियोस्टेसिस के रखरखाव में सहायता करता है और पर्याप्त ऑक्सीजन वितरण सुनिश्चित करता है। स्प्लीन का टूटना (Splenic rupture) एक चिकित्सीय आपात स्थिति है, जिसमे आंतरिक रक्तस्राव जीवन को खतरे में डाल सकता है।

लाल गूदे की स्प्लेनिक डोरियाँ (splenic cords) बड़ी मात्रा में मैक्रोफेज के महत्वपूर्ण भंडार हैं। गंभीर चोट लगने पर, स्प्लीन (spleen) बड़ी मात्रा में मोनोसाइट्स छोड़ता है, जो सूजन को नियंत्रित करने और ऊतक उपचार की सुविधा के लिए रक्तप्रवाह के माध्यम से चोट की जगह पर जाते हैं।


यद्यपि भ्रूण के विकास के दौरान हिमेटोपोइसिस (hematopoiesis) की प्राथमिक साइट स्प्लीन (spleen) से अस्थि मज्जा में स्थानांतरित हो जाती है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में स्प्लीन (spleen) अपनी हेमटोपोइएटिक क्षमता hematopoietic capacity बरकरार रखती है। कुछ हेमटोलॉजिकल विकारों या स्थितियों में जहां अस्थि मज्जा के कार्य से समझौता किया जाता है, स्प्लीन (spleen) अपनी हेमटोपोइएटिक भूमिका फिर से शुरू कर सकती है। इन स्थितियों के तहत, स्प्लीन (spleen) के भीतर हेमेटोपोएटिक स्टेम कोशिकाएं विभिन्न रक्त कोशिका वंशों blood cell lineages में विभेदित होती हैं, जो एरिथ्रोसाइट्स, ग्रैन्यूलोसाइट्स और प्लेटलेट्स का उत्पादन करती हैं।

स्प्लीन (spleen) प्रणालीगत होमियोस्टैसिस (systemic homeostasis) और चयापचय विनियमन (metabolic regulation) में भी योगदान देता है। लौह चयापचय (iron metabolism) में इसकी भूमिका होती है, हीमोग्लोबिन के टूटने से प्राप्त लौह को फैगोसाइटोज्ड एरिथ्रोसाइट्स में संग्रहित किया जाता है ताकि इसे पुनर्चक्रित किया जा सके। इस संग्रहित आयरन को बढ़ी हुई मांग के समय, जैसे एरिथ्रोपोएसिस या आयरन की कमी, के दौरान जुटाया जा सकता है, जिससे लाल रक्त कोशिका उत्पादन के लिए एक स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित होती है।

स्प्लीन या तिल्ली बढ़ने के लक्षण

स्प्लीन या तिल्ली बढ़ने के आमतौर पर कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन कभी-कभी तिल्ली में सूजन के लक्षण निम्न हो सकते हैं।
  • ऊपरी बाएं भाग में पेट में दर्द
  • बिना खाए या थोड़ा सा खाने के बाद पेट भरा हुआ महसूस होना
  • लाल रक्त कोशिकाएं की संख्या में कमी
  • एनीमिया
  • मलेरिया

स्प्लीन बढ़ने के कारण

कई प्रकार के संक्रमण और बीमारियाँ प्लीहा के आकार में वृद्धि का कारण बन सकती हैं।
  • विषाणु संक्रमण
  • बैक्टीरिया का संक्रमण
  • परजीवी संक्रमण
  • मलेरिया
  • लिवर सिरोसिस
  • एनीमिया
  • ल्युकिमिया

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शनिवार, सितंबर 30

आरबीसी (RBC)

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आरबीसी क्या है?

आरबीसी रक्त कणिकाएं होती है जो रक्त का अधिकतर भाग बनाती है। लाल रंग की होने के कारण इसको लाल रक्त कणिका कहते है। इसका लाल रंग उसमें मौजूद हीमोग्लोबिन के कारण होता है। ये रक्त में सबसे अधिक संख्या वाली कोशिकाएँ हैं। आरबीसी का दूसरा नाम एरिथ्रोसाइट (erythrocytes) हैं।

                                  आरबीसी, RBC, Erithrocyte,

आरबीसी का आकार कैसा होता है?

परिपक्व आरबीसी केंद्रक रहित, चपटे, द्विपक्षीय रूप से इंडेंटेड गोले के आकार की होती हैं जिसे अक्सर बाइकोनकेव डिस्क (biconcave disc) के रूप में जाना जाता है। इसका व्यास 7.0-8.0 μm और मोटाई 1.7-2.4 μm होती है। ब्लड फ़िल्म को स्टैंन करने पर केवल चपटी सतहें देखी जाती हैं जिसका बीच का कुछ क्षेत्र कोशिका के मुकाबले हल्के रंग का होता हैं।

आरबीसी फुल फॉर्म (RBC full form)

लाल रक्त कोशिकाओं को संक्षिप्त में आरबीसी लिखा जाता है। यदि आरबीसी का फुल फॉर्म की बात करें तो यह अंग्रेजी के तीन अक्षरों से मिलकर बना एक शब्द है जिसमें आर (R) परिभाषित करता है Red (लाल) को और बी (B) का अर्थ होता है ब्लड (blood) और सी (C) का अर्थ होता है सेल्स (cells) या (corpuscles) अर्थात आरबीसी का पूरा नाम रेड ब्लड सेल्स होता हैं।

आरबीसी - लाल रक्त कोशिका

RBC - Red Blood cell/corpuscles


आरबीसी का निर्माण कहां होता है?

आरबीसी का निर्माण एरिथ्रोपोइसिस (erythropoiesis) कहलाता हैं। एरिथ्रोपोएसिस जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। वयस्कों में लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण हड्डियों के मज्जा में होता हैं जो अक्षीय कंकाल (axial skeleton) बनाते हैं, जिसे अस्थि मज्जा कहते हैं। अस्थि मज्जा आपकी हड्डियों के अंदर का स्पंजी ऊतक है।
गर्भावस्था के दौरान भ्रूण के विकसित होते ही एरिथ्रोपोएसिस का स्थान बदल जाता है। भ्रूण अवस्था में आरबीसी का निर्माण गर्भावस्था का तीसरे सप्ताह में एरिथ्रोपोएसिस Yolk Sac में बनना शुरू होता है। Yolk Sac एक थैलीनुमा संरचना है जो एक विकासशील भ्रूण को पोषण देती है।
गर्भावस्था के दो और तीन महीने में एरिथ्रोपोएसिस भ्रूण के यकृत (Liver) और प्लीहा (spleen) में होता है। पाँचवे महीने तक एरिथ्रोपोएसिस भ्रूण की अस्थि मज्जा में होता है।
जब शिशु का जन्म होता है तब तक एरिथ्रोपोएसिस मुख्य रूप से अस्थि मज्जा में होता है। बच्चो में एरिथ्रोपोएसिस कई अलग-अलग प्रकार की हड्डियों के अस्थि मज्जा (bone marrow) में होता है।
वयस्क में एरिथ्रोपोइज़िस कुछ हड्डियों में होता है, जिसमें श्रोणि, कशेरुक, पसलियां शामिल हैं।

आरबीसी का जीवनकाल कितना होता है?

आरबीसी का औसत जीवन काल 4 माह या 120 दिन का होता है। लाल रक्त कोशिका आमतौर पर रक्त प्रवाह में लगभग 120 दिनों तक जीवित रहती है, जिसके बाद रेटिकुलोएन्डोथेलियल सिस्टम (reticuloendothelial system) की फेगोसाइटिक कोशिकाओं द्वारा इसे हटा दिया जाता है या तोड़ दिया जाता है और इसके कुछ घटकों जैसे आयरन को नई कोशिकाओं के निर्माण के लिए पुन: उपयोग किया जाता है।

आरबीसी का कब्रिस्तान किसे कहते हैं?

आरबीसी का कब्रिस्तान प्लीहा (Spleen) को कहा जाता है। प्लीहा आमाशय और डायफ्राम (Diaphragm) के बीच में यकृत के बाई ओर स्थित लगभग 12 सेमी. लंबी गहरे लाल रंग की संकरी एवं चपटी सी लसिका ग्रंथि होती हैं। यह रेटिकुलोएंडोथिलियम ऊतक का सबसे बड़ा पिंड होता है। प्लीहा की कोशिकाएं रुधिर के टूटे-फूटे और शिथिल रुधिराणुओं तथा निरर्थक एवं हानिकारक रंजक एवं अन्य पदार्थों का भक्षण करके रुधिर की सफाई करता है।


आरबीसी के कार्य

आरबीसी मुख्य रूप से ऊतक श्वसन में शामिल होते हैं। लाल कोशिकाओं में वर्णक हीमोग्लोबिन (hemoglobin) होता है जो ऑक्सीजन के साथ संयोजन करने की क्षमता रखता है। फेफड़ों में आरबीसी में हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन के साथ संयोजन करता है और अपने परिसंचरण के दौरान इसे शरीर के ऊतकों (जहां ऑक्सीजन तनाव कम होता है) में छोड़ता है। कार्बनडाइऑक्साइड, चयापचय का एक अपशिष्ट उत्पाद है, जिसे आरबीसी द्वारा ऊतकों से अवशोषित किया जाता है और साँस छोड़ने के लिए फेफड़ों में ले जाया जाता है।


आरबीसी की संख्या कितनी होनी चाहिए? 

आरबीसी नॉर्मल रेंज या पुरुषों में आरबीसी की संख्या कितनी होती है?

एक वयस्क पुरूष के ब्लड में प्रति माइक्रो लीटर ब्लड में आरबीसी की संख्या साढे 45 लाख से 50 लाख के बीच होनी चाहिए।
Men: 4.5 to 5 million RBCs per microliter of blood

एक वयस्क महिला में आरबीसी की संख्या प्रति माइक्रो लीटर ब्लड में 40 लाख से 50 लाख के बीच होनी चाहिए।
Women: 4.0 to 5 million RBCs per microliter of blood

बच्चों में प्रति माइक्रो लीटर ब्लड में आरबीसी की संख्या साढे 45 लाख से 50 लाख के बीच होनी चाहिए।
Children: 4.0 to 5 million RBCs per microliter of blood


आरबीसी गिनती या आरबीसी काउंट (RBC Count)

लैब में आरबीसी की संख्या को गिना जा सकता है जिसे लैब टेस्ट के रूप में आरबीसी काउंट से जाना जाता है। इससे सीबीसी टेस्ट में भी जाना जा सकता है या केवल आरबीसी काउंटिंग चैंबर जिसे न्यू बार चैंबर कहा जाता है, के माध्यम से काउंट करके देखा जाता है। आरबीसी काउंट निम्नलिखित प्रक्रिया से किया जा सकता हैं।

आरबीसी काउंट की प्रक्रिया (Test Procedure)

• रक्त को आरबीसी पिपेट में 0.5 अंक तक भरें।
• RBC डाईल्युटिग द्रव को 101 अंक तक भरें और घुमाकर अच्छी तरह मिला लें। इससे 1:200 का तनुकरण (dilution) हो जाता है।
आरबीसी पिपेट की अनुपस्थिति में इसे टेस्ट ट्यूब में भी तैयार किया जा सकता हैं। इसके लिए एक टेस्ट ट्यूब में 3.98 ml डाईल्युटिग द्रव में 0.02 मिलीलीटर (20 μl) रक्त मिलाया जाता है।
रक्त के लिए हीमोग्लोबिनोमीटर पिपेट का उपयोग भी किया जा सकता हैं।
• चैम्बर के ऊपर एक कवर स्लिप रखें। एक विशेष 4 मिमी मोटी
बहुत चिकनी सतह और समान मोटाई वाली कवरस्लिप का उपयोग किया जाता है, ताकि चैम्बर की ऊंचाई बिल्कुल 0.1 मिमी हो।
• पिपेट में डाईल्युटिग द्रव की पहली 2-3 बूँदें निकाल दें।
• पिपेट से चैम्बर में भरने के लिए थोड़ी मात्रा में डाईल्युटिग द्रव छोड़ कर चैम्बर को धीरे से चार्ज करें। चैम्बर को चार्ज करते समय सावधानी बरतनी चाहिए।
– पिपेट की नोक की एक बार में ही फिलिंग करनी चाहिए।
- कवरस्लिप के नीचे कोई हवा का बुलबुला नहीं होना चाहिए।
- तरल पदार्थ नाली में नहीं जाना चाहिए।
• चार्ज करने के बाद 3 मिनट तक प्रतीक्षा करें, ताकि सेल व्यवस्थित हो जाएं।
• माइक्रोस्कोप को 10× में फोकस करें और आरबीसी को 40× ऑब्जेक्टिव लेंस में बीच के कॉर्नर के 5 बॉक्स में गिनें।
• उन कोशिकाओं की गिनती करें जो दाहिनी और निचली रेखाओं पर स्थित हैं।
• आरबीसी की संख्या प्राप्त करने के लिए कुल आरबीसी संख्या (एन) को 10,000 से गुणा किया जाता है।

Calculation

Volume of 5 squares = 5 × 1/5 × 1/5 × 1/10 = 1/50 cmm
1/50 cmm contains = N × dilution
So, 1 cmm contains = N × 200 × 50
= N × 10,000
Normal RBC count is 4.5–5.5 million/cmm


आरबीसी कम करने के उपाय

आरबीसी की संख्या को कम करने के कई कारक जिम्मेवार है। यदि इन कारक को जान लिया जाए तो आरबीसी की संख्या में कमी को पूरा किया जा सकता है। जैसे यदि व्यक्ति में आयरन की कमी होती है या फोलिक एसिड की कमी होती है या विटामिन B12 की कमी होती है तो आरबीसी की संख्या में अत्यधिक कमी आती है। यदि इन तत्वों की पूर्ति कर दी जाए तो आरबीसी की संख्या को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा यदि किसी में ब्लड में कमी हो जाता है तो ब्लड चढ़ा कर भी आरबीसी की संख्या की पूर्ति की जा सकती है।

आरबीसी की कमी के लक्षण

व्यक्ति में आरबीसी की कमी होने पर कई लक्षण दिखाई देते हैं। आरबीसी की संख्या में कमी को एनीमिया के रूप में जाना जाता है। तो जो लक्षण एनीमिया के होते हैं वही आरबीसी की कमी होने पर दिखाई देते हैं।
जैसे -
  • त्वचा का रंग हल्का होना
  • जीभ का रंग हल्का होना
  • सांस लेने में परेशानी आना
  • चक्कर आना आदि

आरबीसी की कमी से कौन सा रोग होता है?

  • Anemia
  • Leukemia
  • Chronic kidney diseases
  • liver Cirrhosis
  • Vitamin B-12 or folate deficiency
  • Stomach ulcers
  • Lupus
  • Hypothyroidism
  • Inflammatory bowel disease
  • Hodgkin lymphoma

आरबीसी ज्यादा होने के नुकसान या आरबीसी बढ़ने से क्या होता है?

आरबीसी की संख्या में वृद्धि काफी गंभीर विषय है। आरबीसी की संख्या में वृद्धि को पॉलीसाईथीमिया (Polycythemia) के नाम से जाना जाता है जिसमें आरबीसी का मान सामान्य से अधिक हो जाता है । इस अवस्था में ब्लड को डाइल्यूट करने की आवश्यकता होती है तो इसके लिए मेडिसिन दी जा सकती है। आरबीसी की संख्या ज्यादा होने से ब्लड गाढ़ा होता है, जिससे इसको सामान्य रूप से बहने में परेशानी होती है और कई बार यह आपके हार्ट अटैक का कारण भी हो सकता है। इसके लिए इसको नियंत्रित रखने के लिए बाजार में कई तरह की मेडिसिन उपलब्ध है।

आरबीसी की अधिकता से रोग 

Congenital heart disease
Kidney tumors
Lung diseases
pulmonary fibrosis
Dehydration
Polycythemia, cyanotic heart disease, hemoconcentration,
Infants


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बुधवार, अगस्त 30

20 मिनट का क्लोटिंग टेस्ट (20 whole blood clotting test)

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20WBCT क्या है? (what is 20WBCT test)

लगभग 50 वर्षों से सर्पदंश (snack bite) के बाद कोगुलोपैथी का पता लगाने के लिए 20 मिनट का क्लोटिंग टेस्ट (20WBCT) का उपयोग किया जाता रहा है।
20 WBCT का वर्णन पहली बार 1977 में वॉरेल और उनके सहयोगियों द्वारा (Warrell and colleagues) किया गया था।
सांप के जहर में एंटी-क्लॉटिंग एजेंट (anti clotting agent) पाया जाता हैं जो रक्त को जमने से रोकता हैं। यदि किसी व्यक्ति को सांप ने डस लिया है और सांप जहरीला हैं तो उसकी क्लोटिंग प्रक्रिया प्रभावित होगी जिसे कोगुलोपैथी कहा जाता हैं। कोगुलोपैथी का पता लगाने के लिए 20WBCT की सटीकता का मूल्यांकन करने के लिए 20WBCT एक व्यवस्थित टेस्ट हैं जो सांप के जहर का संकेतक है।

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20WBCT की आवश्यकता

20WBCT टेस्ट को विशेष रूप से लागत, गति, सीमित प्रयोगशाला संसाधनों और सीमित एंटीवेनम आपूर्ति वाले स्थानों में करने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन किया गया था।
दुर्भाग्य से चूंकि अधिकांश सर्पदंश सुदूर भौगोलिक स्थानों में होते हैं, पारंपरिक क्लॉटिंग टेस्ट आमतौर पर उपलब्ध नहीं होते हैं। परिणामस्वरूप थक्के (clot) की असामान्यताओं का पता लगाने के लिए कई बेडसाइड टेस्ट का उपयोग किया जाता है - 20WBCT, 30WBCT, कैपिलरी से क्लोटिंग टाइम और ली-व्हाइट का क्लॉटिंग टाइम टेस्ट शामिल हैं।
20WBCT सर्पदंश के जहर के इलाज में सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला बेडसाइड क्लॉटिंग परीक्षण है और WHO के सर्पदंश प्रबंधन दिशानिर्देशों में अनुमोदित है।

20 WBCT टेस्ट का सिद्धांत (WBCT test principle)

जब एक ट्यूब में ब्लड की कुछ मात्रा को निश्चित समय के लिए रख दिया जाता हैं तो विभिन्न क्लोटिंग फैक्टर की मदद से रक्त जम जाता हैं, जिसे क्लोटिंग कहा जाता हैं। रक्त का थक्का बनने में देरी क्लोटिंग प्रक्रिया में असामान्य क्लोटिंग प्रक्रिया को दर्शाता हैं।

20 WBCT टेस्ट के लिए आवश्यक अभिकर्मक और सामग्री

1. सिरिंज (syringe)
2. काँच की टेस्ट ट्यूब (test tube)
3. डिस्पोजेबल दस्ताने (gloves)
6. टाइमर (stop watch)
7. अल्कोहल स्वैब (alcohol swabs)
9. डिस्पोजल कंटेनर

20 WBCT टेस्ट के लिए सैंपल संग्रह और उपयोग

20 WBCT टेस्ट के लिए रक्त नमूनों में सम्पूर्ण रक्त (whole blood) का उपयोग लिया जाता हैं जिसमें किसी प्रकार का एडिटिव नहीं मिलाया जाता हैं, और ना ही टयूब में कोई एन्टीकॉअगुलेट मिलाया जाता हैं।

20 WBCT टेस्ट की प्रक्रिया (20 WBCT test procedure)

20 WBCT में ताजा एकत्रित रक्त को एक साफ सूखी ग्लास टेस्ट ट्यूब में डालना शामिल है जिसे 20 मिनट के लिए बिना किसी छेड़छाड़ के छोड़ दिया जाता है और फिर यह पता लगाया जाता है कि रक्त का थक्का जम गया है या नहीं।

1. मरीज से शिरापरक रक्त (vanous blood) का एक सिरिंज की सहायता से इकट्ठा करें।

2. लगभग 2 मिलीलीटर रक्त को एक साफ सूखी काँच की टेस्ट ट्यूब में डालें।

3. अलार्म को 20 मिनट के समय पर सेट करें।

4. इस टेस्ट ट्यूब को कमरे के तापमान पर 20 मिनट के लिए छोड़ दें।

5. 20 मिनट बाद ट्यूब को टेढ़ी करके थक्के की उपस्थिति को देखें कि रक्त का थक्का बना है या नहीं।
                                 

टेस्ट परिणाम की व्याख्या

20 WBCT टेस्ट करने के बाद दो तरह के परिणाम (result) देखने को मिलते है, जो इस प्रकार है।

1. 20 WBCT टेस्ट नेगेटिव
जब एक सख्त क्लॉट, जो टयूब में बना है और आसानी से रक्त को बहने नहीं देता हैं तो 20 WBCT टेस्ट को नकारात्मक (negative) माना जाता है और यह कोगुलोपैथी का सूचक नहीं है।

2. 20 WBCT टेस्ट पॉजिटिव
बिना रूका हुआ खून या एक थक्का जो ट्यूब को 20 मिनट में एक बार हिलाने पर आसानी से टूट जाता है, एक संभावित क्लॉटिंग विकार (clotting disorder) का संकेत देता है। जो रक्त 20 मिनट के बाद जमने में विफल रहता है उसे सकारात्मक (positive) माना जाता है और यह कोगुलोपैथी (coagulopathy) का सूचक है और इस प्रकार यह प्रणालीगत विषाक्तता का संकेत देता है।

20 WBCT टेस्ट की विशेषताए

बिना प्रत्यक्ष रक्तस्राव वाले रोगियों में कोगुलोपैथी (coagulopathy) की जांच के लिए बेसलाइन 20 मिनट का संपूर्ण रक्त थक्का परीक्षण (20WBCT) करें।
20 WBCT आपातकालीन प्रयोगशाला सुविधाओं तक सीमित पहुंच वाले क्षेत्रों में कोगुलोपैथी की जांच और निगरानी करने के लिए एक सरल, तेज़ और सस्ता बेडसाइड परीक्षण है।
20 मिनट के संपूर्ण रक्त के थक्के जमने के परीक्षण के उदाहरण
ए) सामान्य रक्त में नमूना एकत्र करने के 20 मिनट बाद एक थक्का दिखाई देता है।
बी) सांप के जहर से पीड़ित रोगी का 20 मिनट में गाढ़ा होने वाला रक्त।

निष्कर्ष

समय के साथ गंभीर रक्तस्राव के जोखिम वाले रोगियों की पहचान करने के लिए 20WBCT का उपयोग इसके प्रारंभिक डिजाइन से विकसित हुआ है। हेमोटॉक्सिक जहर का पता लगाने के टेस्ट के रूप में 20WBCT को शामिल किया है।
सर्पदंश की रोकथाम और नियंत्रण के लिए डब्ल्यूएचओ की रणनीति के प्रकाश में, जिसने सभी के लिए सुरक्षित और प्रभावी उपचार उपलब्ध कराने, सुलभ और किफायती बनाने के महत्व पर प्रकाश डाला, और जहर की जटिलताओं को रोकने के लिए एंटीवेनम के प्रारंभिक प्रशासन के महत्व पर प्रकाश डाला और व्यवस्थित रूप से सबूतों की समीक्षा की। कोगुलोपैथी का पता लगाने की निचली सीमा के मुकाबले 20WBCT की तुलना की गई। समीक्षा का प्राथमिक उद्देश्य प्रयोगशाला क्लॉटिंग टेस्ट द्वारा परिभाषित कोगुलोपैथी का पता लगाने में 20WBCT की संवेदनशीलता और विशिष्टता की पहचान करना था, जो सर्पदंश के बाद प्रणालीगत जहर का संकेत है।



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रविवार, अगस्त 20

सर्पदंश और लैब टेस्ट (Lab-tests-in-snake-bite)

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सांप काटना या सर्पदंश (Snake bite) ग्रामीण क्षेत्रों में पाई जाने वाली विशेष स्थिति है, जिसमें अनुमानित 1.8 से 2.7 मिलियन मामले विषैले होते हैं और प्रति वर्ष लाखों मौतें होती हैं। भारत में सांपों की 250 प्रजातियां हैं, जिनमें से 4 सबसे अधिक घातक हैं। कॉमन कोबरा, सॉ-स्केल्ड वाइपर, कॉमन क्रेट और रसेल वाइपर। विभिन्न प्रजातियाँ अलग-अलग प्रकार का जहर रखती हैं। जिसके प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं:-

1. साइटोटॉक्सिन (Cytotoxins)
जहां भी सांप ने काटा है, वहां सूजन और त्वचा को नुकसान पहुँचता है।
2. रक्तस्राव (Haemorrhagins)
रक्त वाहिकाओं को बाधित करता है।
3. एंटी-क्लॉटिंग एजेंट (anti clotting agent)
रक्त को जमने से रोकता हैं जिससे रक्तस्राव हो सकता हैं।
4. न्यूरोटॉक्सिन (Neurotoxins)
पक्षाघात हो सकता है या तंत्रिका को क्षति पहुंचाते हैं।

                snake-bite

सांप काटने पर सबसे जरूरी है कि उसके लक्षणों की पहचान कर उसका तुरंत उपचार करना। तो आइए जानते हैं कि यदि सांप काट ले तो क्या करें और क्या ना करें।

सांप के काटने पर क्या करें?

  • सांप के काटने पर तुरंत एंबुलेंस को कॉल करें।
  • व्यक्ति को सांप से दूर ले जाएं।
  • यदि घाव दिल के नीचे है तो व्यक्ति को तुरंत लिटा दें।
  • व्यक्ति को शांत और आरामदायक स्थिति में रखें और जहर को फैलने से रोकने के लिए जितना संभव हो सके व्यक्ति को स्थिर रखें।
  • घाव को ढीली और साफ पट्टी से कवर करें।
  • प्रभावित हिस्से से किसी भी गहने या टाइट कपड़े को हटा दें।
  • यदि सांप ने पैर पर काटा है तो जूतों को निकाल दें।
  • सांप के काटने के समय का ध्यान रखें।

सांप के काटने पर क्या न करें?

  • डॉक्टर की सलाह मशविरा किए बग़ैर व्यक्ति को कोई दवा न दें।
  • यदि सांप के काटने का घाव व्यक्ति के दिल से ऊपर की ओर है। घाव को न काटें।
  • जहर को बाहर चूसने का प्रयास न करें।
  • घाव पर ठंडे संपीड़न, बर्फ आदि का प्रयोग न करें।
  • व्यक्ति को अल्कोहल या कैफीनयुक्त पेय न दें।
  • पीड़ित को चलने न दें। उन्हें वाहन से या उठा कर ले जाएं।
  • सांप को मारने या पकड़ने का प्रयास न करें। यदि सम्भव हो तो सांप की तस्वीर ले।
  • किसी भी पंप सक्शन डिवाइस का उपयोग न करें।

सांप के काटने के लक्षण क्या हैं?

  • सांप के काटने का निशान या घाव
  • मांसपेशियों की क्षति (मांसपेशियों में कोमलता, हिलने-डुलने पर दर्द, कमजोरी)
  • घाव के चारों ओर सूजन (swelling)
  • कोगुलोपैथी (मसूड़ों से खून आना, वेनपंक्चर वाली जगहों या काटने की जगह सहित अन्य घावों से लंबे समय तक रक्तस्राव)
  • जी मिचलाना (Nausea)उल्टी (vomiting)
  • जलन और लालिमा (Redness)
  • ब्लड प्रेशर कम होना (Low blood pressure)
  • दिल का तेज धड़कना और नब्ज कमजोर होना
  • थकान मांसपेशियों की कमजोरी
  • प्यास लगना
  • अकड़न या कंपकंपी
  • एलर्जी
  • पलकों का गिरना
  • त्वचा के रंग में बदलाव
  • दस्त (diarrhea)
  • बुखार
  • पेट दर्द
  • सिरदर्द (headaches)
  • लकवा मारना
  • एक बार काटने/एक से अधिक बार काटने का साक्ष्य
  • जहर की गति के साक्ष्य (उदाहरण के लिए सूजी हुई या कोमल जल निकासी वाली लिम्फ नोड्स)
  • न्यूरोटॉक्सिक पक्षाघात

कैसे पहचाने कि सांप विषैला है या नहीं?

जहरीले सांप का सिर बड़ा और त्रिभुजाकार होता है जबकि गैर जहरीले सांप का शीर्ष सामान्य होता है।
आमतौर पर 2 दांत के निशान जहरीले सांप के होते हैं और छोटे-छोटे बहुत सारे निशान गैर जहरीले सांप के।


सांप काटने पर प्राथमिक उपचार (First aid)

  1. सांप काटने की जगह को साबुन और पानी से धोना चाहिए। साथ ही उस पर साफ/स्टाइल कपड़े से ड्रेसिंग कर सकते हैं।
  2. सांप काटने की जगह को ऊपर से बांध सकते हैं, परंतु ज्यादा जोर से बांधने पर पैर/हाथ की ब्लड सप्लाई रुक जाता है और पैर/हाथ काटने की नौबत आ जाती है। एक व्यापक दबाव वाली पट्टी बांधे। इसका उद्देश्य जहर के लसीका प्रसार को रोकना है न कि रक्त की आपूर्ति को रोकना।
  3. काटने वाली जगह से शुरू करें और पूरे अंग पर पट्टी बांधें।
  4. काटने वाली जगह के दोनों ओर के जोड़ों को स्थिर करें (स्प्लिंट का उपयोग करें)
  5. मरीज बच्चे हो तो उन्हें ज्यादा हिलने डुलने ना दे, स्थिर रखें।
  6. जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, पूर्ण उपचार सुविधाओं वाले केंद्र में जाने तक पट्टी को न हटाएं। यदि जहर है, तो एंटीवेनम दिए जाने तक न हटाएं। एक बार विषरोधी दवा दे दिए जाने के बाद पट्टी को हटा दें। काटने वाली जगह को किसी भी तरह से धोएं या साफ न करें।

सांप काटने पर लैब टेस्ट (Laboratory Studies)

कोगुलोपैथी (Coagulopathy) सांप के जहर की एक सामान्य डायग्नोसिस है जो एंटीवेनम की आवश्यकता का संकेत देती है। रक्तस्राव प्रवणता काटने की जगह से सहज रक्तस्राव, एक्चिमोसिस और श्लेष्म झिल्ली से रक्तस्राव के रूप में प्रकट हो सकती है। कभी-कभी मरीज़ों में विनाशकारी गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, रेट्रोपेरिटोनियल या इंट्राक्रानियल रक्तस्राव विकसित हो जाता है। हालाँकि, कोगुलोपैथी वाले कई रोगियों में प्रस्तुति के समय प्रणालीगत जहर की कोई स्पष्ट नैदानिक विशेषताएं नहीं होती हैं। इन रोगियों को जो एंटीवेनम से लाभ उठा सकते हैं। संभावित सर्पदंश वाले मरीजों को निम्नलिखित प्रयोगशाला टेस्ट करवाने चाहिए।

कॉअगुलेशन प्रोफाइल (20WBCT, PT INR, APTT, fibrinogen, D-dimer)

हेमोटॉक्सिक सांप के जहर में विभिन्न प्रकार के विभिन्न लक्ष्यों के साथ प्रो-कौयगुलेंट और एंटी-कौयगुलांट प्रोटीन और पेप्टाइड्स होते हैं। सांप के जहर मेटालो-प्रोटीनेज और सांप के जहर सेरीन प्रोटीनेज फैक्टर वी, फैक्टर एक्स और प्रोथ्रोम्बिन के सक्रियण के माध्यम से थक्के के कैस्केड को प्रभावित करते हैं। थ्रोम्बिन-जैसे एंजाइम, पिट-वाइपर के विशिष्ट, क्लॉटिंग कैस्केड में हस्तक्षेप किए बिना फाइब्रिनोजेन के फाइब्रिन में रूपांतरण को बाधित कर सकते हैं। आमतौर पर कुछ साँप सी-टाइप लेक्टिन-जैसे प्रोटीन (स्नैक्लेक्स) और फॉस्फोलाईपेज़ में एंटी-कॉअगुलेशन प्रभाव होते हैं जैसे कि कारक IX को IXa में बदलने से रोकना और बाहरी टेनेज़ कॉम्प्लेक्स को रोकना। हेमोस्टेसिस में और अधिक व्यवधान कम प्लेटलेट सक्रियण और एकत्रीकरण के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।

20WBCT

20WBCT टेस्ट एक सरल, सस्ता, त्वरित, उच्च विशिष्टता और स्वीकार्य संवेदनशीलता के साथ सर्पदंश के बाद कोगुलोपैथी का पता लगाने में सक्षम क्लॉटिंग टेस्ट है जो सर्पदंश के बाद कोगुलोपैथी का पता लगाने के लिए तैयार किया गया है। टेस्ट का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है और इसे कई राष्ट्रीय और WHO दिशानिर्देशों में शामिल किया गया है।
कोगुलोपैथी की रिकवरी की जांच के लिए 6, 12 और 24 घंटों पर 20WBCT दोहराया जाना चाहिए।

Complete blood cell count (CBC)

हेमटोक्रिट (PCV/Hct) में कमी आमतौर पर खून की कमी के साथ होती है। सामान्य से अधिक मान प्रणालीगत प्लाज्मा अपव्यय से हेमोसांद्रण का संकेत दे सकता है। न्यूट्रोफिलिक ल्यूकोसाइटोसिस इन्फ्लेमेशन का प्रतिनिधित्व करता है और प्रणालीगत विषाक्तता की पुष्टि करता है। थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (प्लेटलेट काउंट < 150 x 10 3/µL) गंभीर थ्रोम्बोसाइटोपेनिया रक्तस्रावी डायथेसिस में योगदान देता है। रक्त फिल्म में शिस्टोसाइट्स और किडनी की चोट के साथ होने पर यह माइक्रोएंजियोपैथिक हेमोलिसिस का संकेत दे सकता है।

डी-डाईमर (D-dimer)

सांप के काटने के कम से कम दो घंटे बाद डी-डाईमर 2.5 मिलीग्राम/लीटर के कट-ऑफ मान के साथ उच्च संवेदनशीलता और विशिष्टता प्रदान करेगा और सर्पदंश के तीन घंटे के भीतर एंटीवेनम देने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा। एक रक्त परीक्षण जो रक्त के थक्के जमने की समस्याओं की जांच या निगरानी करता है- विष-प्रेरित उपभोग कोगुलोपैथी (VICC) के शीघ्र निदान में एक महत्वपूर्ण सहायता हो सकती है।
वीआईसीसी विकसित करने वाले 95% रोगियों में काटने के तीन घंटे बाद तक डी-डिमर का मान 2.5 मिलीग्राम/लीटर से अधिक था और काटने के छह घंटे बाद तक 95% गैर-जहर वाले रोगियों के लिए 2.5 मिलीग्राम/लीटर से कम था।
सर्पदंश के 2-3 घंटों के बाद डी-डिमर स्तर में परिवर्तन गैर-जहर वाले रोगियों और वीआईसीसी वाले रोगियों के बीच स्पष्ट रूप से भिन्न होता है।

यूरिया और क्रिएटिनिन (Urea and Creatinine

रक्त मे स्थित यूरिया, सीरम क्रिएटिनिन और इलेक्ट्रोलाइट स्तर स्क्रीन और तीव्र गुर्दे की चोट की निगरानी में सहायता 10000 यूनिट/लीटर से ऊपर सीपीके स्तर गंभीर रबडोमायोलिसिस का संकेत देता है।
सांप के जहर के बाद अस्पष्टीकृत हाइपोग्लाइकेमिया तीव्र हाइपोपिटुटेरिज्म का एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।

Prothrombin time - प्रोथ्रोम्बिन समय >15 सेकंड कोगुलोपैथी का संकेत हैं।

Fibrinogen value - हाइपोफाइब्रिनोजेनमिया (फाइब्रिनोजेन <150 mg/dL)

activated partial thromboplastin times (APTT)

इलेक्ट्रोलाइट्स (Electrolytes)

liver function tests

क्रिएटिन काईनेज (Creatine Kinase)

Urinalysis - गहरा या लाल मूत्र मायोग्लोबिन्यूरिया का संकेत

blood type and crossmatch

venous blood gas analysis.


सांप के काटने पर उपचार

मरीज में जहर की मात्रा के अनुसार एन्टी वेनम की वायल को 0.9% नार्मल सेलाइन (NS) में Dilute करके धीरे धीरे IV इंफ्यूजन के रूप में दें।
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बुधवार, अगस्त 2

हेपेटाइटिस बी (Hepatitis B)

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हेपेटाइटिस बी क्या हैं?

हेपेटाइटिस बी (Hepatitis B) का संक्रमण हेपेटाइटिस बी वायरस (HBV) के कारण होता है। हेपेटाइटिस बी वायरस viremia का सबसे आम कारण है और क्रोनिक लीवर रोग और हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा का सबसे महत्वपूर्ण कारण है।
हेपेटाइटिस बी का संक्रमण कई सहस्राब्दियों तक फैला हो सकता है। अनुमान है कि दुनिया में हेपेटाइटिस बी के 300 मिलियन क्रोनिक (chronic) वाहक हैं। वाहक दरें जहाँ पश्चिमी देशों में मिनिमम 0.3% हैं वहीं एशिया, अफ्रीका में 20% तक भिन्न-भिन्न हैं।

हेपेटाइटिस बी, Hepatitis B,

हेपेटाइटिस बी वायरस (Hepatitis B Virus)

हेपेटाइटिस बी एक हेपेटोट्रोपिक डीएनए वायरस है। वायरस के मूल में डीएनए पोलीमरेज़, कोर एंटीजन (HBcAg) और "ई" एंटीजन (HBeAg) होते हैं। हेपेटाइटिस बी का मूल एक आवरण में घिरा होता है जिसमें लिपिड, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट होते हैं और यह एक एंटीजन erms हेपेटाइटिस बी सतही एंटीजन (HBsAg) को व्यक्त करता है।
हेपेटाइटिस बी, hepatitis b,

HBsAg एक्यूट हेपेटाइटिस बी में रक्त में दिखाई देने वाला पहला मार्कर है, जिसका पता एक्सपोज़र के 1 सप्ताह से 2 महीने बाद और लक्षणों की शुरुआत से 2 सप्ताह से 2 महीने पहले लगाया जा सकता है। हेपेटाइटिस बी वायरस शरीर के बाहर कम से कम 7 दिनों तक जीवित रह सकता है। इस दौरान यदि यह किसी ऐसे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करता है जो टीके से सुरक्षित नहीं है तो वह तब भी वायरस से संक्रमित हो सकता है।

हेपेटाइटिस बी वायरस की इन्क्यूबेशन अवधि (incubation period) 30 से 180 दिनों तक होती है। संक्रमण के 30 से 60 दिनों के भीतर वायरस का पता लगाया जा सकता है, और क्रोनिक हेपेटाइटिस बी में विकसित हो सकता है।
HBsAg क्रोनिक वाहक अवस्था में लंबी अवधि तक (6-12 महीने) बना रहता है, जिसमें संबंधित एंटीबॉडी में कोई सीरो-रूपांतरण नहीं होता है। इसलिए सभी रक्तदाताओं, गर्भवती महिलाओं और उच्च जोखिम वाले समूहों के लोगों के लिए HBsAg की जांच अत्यधिक आवश्यक है।

हेपेटाइटिस बी के लक्षण

  • त्वचा और आंखों और नाख़ून का पीलापन (पीलिया)
  • पेट में दर्द
  • भूख में कमी
  • मतली या उलटी (Nausea/vomiting)
  • गहरे पीले रंग का मूत्र
  • कमजोरी और थकान.
  • हल्का बुखार रहना

हेपेटाइटिस बी कैसे फैलता है या हेपेटाइटिस बी कैसे होता है?

हेपेटाइटिस बी संक्रमण हेपेटाइटिस बी वायरस के कारण होता है। यह वायरस रक्त, वीर्य या शरीर के अन्य तरल पदार्थों के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। यह छींकने या खांसने से नहीं फैलता है। हेपेटाइटिस बी संक्रमित व्यक्ति के रक्त, वीर्य या शरीर के अन्य तरल पदार्थों के संपर्क में आने से फैलता है। हेपेटाइटिस बी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है यदि
  • कोई एक से अधिक व्यक्तियों के साथ यौन संबंध बनाता है।
  • हेपेटाइटिस बी से संक्रमित किसी व्यक्ति के साथ असुरक्षित संबंध बनाता है।
  • दवा या ड्रग्स के उपयोग के दौरान सुइयों को साझा करता है।
  • ऐसे व्यक्ति के साथ रहने से जिसमें क्रोनिक हेपेटाइटिस बी का संक्रमण हो।
  • शिशु का जन्म संक्रमित माँ से हुआ हो। 
  • मानव रक्त के संपर्क में आने वाले लैबकर्मी।
  • हेपेटाइटिस बी संक्रमण की उच्च संक्रमण दर वाले क्षेत्रों की यात्रा।

हेपेटाइटिस बी क्यों होता है?

एचबीवी फैलने के चार सामान्य तरीके हैं:-
यौन संपर्क (Sexual contact)
यदि कोई किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध बनाते हैं तो उन्हें हेपेटाइटिस बी का संक्रमण हो सकता है। यदि व्यक्ति का रक्त, लार, वीर्य या योनि स्राव अन्य व्यक्ति के शरीर के संपर्क में आ जाते है तो वायरस आप तक पहुंच सकता है।

सुइयों का आदान-प्रदान
हेपेटाइटिस बी संक्रमित रक्त से दूषित सुइयों और सीरिंज के माध्यम से आसानी से फैलता है। नशीली दवाओं का इंजेक्शन लगाने वाले व्यक्तियों के बीच दूषित सुइयों और सीरिंज या तेज धारदार वस्तुओं के पुन: उपयोग के माध्यम से भी हो सकता है। नसों से दवा साझा करने से आपको हेपेटाइटिस बी का खतरा अधिक होता है।

आकस्मिक सुई लगना (needle sticks injury)
हेपेटाइटिस बी हॉस्पिटल कर्मियों और मानव रक्त के संपर्क में आने वाले लैबकर्मियों के लिए चिंता का विषय है। हॉस्पिटल में ब्लड सैंपल कलेक्शन के दौरान अचानक सुई लगना या सम्पूर्ण रक्त, सीरम या प्लाज्मा के संपर्क में आने से भी फैलता है।

माँ से बच्चे तक (perinatal transmission)
हेपेटाइटिस बी से संक्रमित गर्भवती महिलाएं प्रसव के दौरान अपने बच्चों को यह वायरस ट्रान्सफर कर सकती हैं। हालाँकि सभी मामलों में संक्रमित होने से बचने के लिए नवजात शिशु को टीका लगाया जा सकता है। यदि कोई महिला गर्भवती हैं या गर्भवती होना चाहती हैं तो हेपेटाइटिस बी टेस्ट के बारे में जानकारी प्राप्त करें।

हेपेटाइटिस बी की जांच (Hepatitis B Test)

हेपेटाइटिस बी की जाँच के लिए केवल रक्त के नमूने की आवश्यकता होती है। हेपेटाइटिस बी सीरोलॉजिकल टेस्ट में हेपेटाइटिस बी वायरस के विशिष्ट एंटीजन और एंटीबॉडी को गुणात्मक और मात्रात्मक तरीके से पता लगाया जा सकता है।

हेपेटाइटिस बी सतही एंटीजन (Hepatitis B surface antigen or HBsAg)

हेपेटाइटिस बी वायरस की सतह पर एक प्रोटीन जिसे एक्यूट (acute) या क्रोनिक (chronic) हेपेटाइटिस बी वायरस संक्रमण के दौरान सीरम में उच्च स्तर पर पाया जा सकता है। HBsAg की उपस्थिति इंगित करती है कि व्यक्ति में हेपेटाइटिस बी वायरस का संक्रमण है। HBsAg के अलावा ऊपर वर्णित अन्य कई एंटीजन हैं जिसे रक्त में टेस्ट द्वारा जांचा जा सकता हैं।

हेपेटाइटिस बी नार्मल रेंज क्या है?

हेपेटाइटिस बी के गुणात्मक टेस्ट जो कि एक रेपिड कार्ड पर आधारित होता हैं। इसका परिणाम नेगेटिव और पॉजिटिव में दिया जाता हैं। यदि टेस्ट मात्रात्मक हैं तो आपको हेपेटाइटिस बी वायरस का वायरल लोड बताया जाएगा। इस समय आपको हेपेटाइटिस बी की नार्मल रेंज पता होनी चाहिए। हेपेटाइटिस बी वायरल लोड नार्मल रेंज 10-1,000,000,000 IU/mL होती हैं।

हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव क्या होता है?

यदि आपकी टेस्ट रिपोर्ट में हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव लिखा हुआ होता है तो इसका अर्थ है कि व्यक्ति में हेपेटाइटिस बी वायरस का संक्रमण हैं। इसके स्थान पर यदि टेस्ट रिपोर्ट में हेपेटाइटिस बी नेगेटिव लिखा हुआ होता है तो इसका अर्थ है कि व्यक्ति में हेपेटाइटिस बी वायरस का संक्रमण नहीं हैं।       
             हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव, hepatitis b positive,

हेपेटाइटिस बी का इलाज 

एक्यूट हेपेटाइटिस बी (acute hepatitis B) के लिए कोई विशिष्ट उपचार नहीं है। क्रोनिक हेपेटाइटिस बी (Chronic hepatitis B) का इलाज दवाओं से किया जा सकता है।
एक्यूट हेपेटाइटिस बी से पीड़ित व्यक्ति की देखभाल का ध्यान व्यक्ति को आरामदायक बनाने पर केंद्रित होना चाहिए। उल्टी और दस्त से होने वाले निर्जलीकरण को रोकने के लिए उन्हें स्वस्थ आहार खाना चाहिए और खूब सारे तरल पदार्थ पीने चाहिए।

हेपेटाइटिस बी की टेबलेट / हेपेटाइटिस बी की दवाएं

क्रोनिक (chronic) हेपेटाइटिस बी संक्रमण का इलाज टीनोफोविर (tenofovir) या एंटेकाविर (entecavir) जैसी दवाओं से किया जा सकता है।

हेपेटाइटिस बी का टीका (Hepatitis B vaccine)

हेपेटाइटिस बी का टीका कब लगता है?

हेपेटाइटिस बी को सुरक्षित और प्रभावी टीके से रोका जा सकता है। टीका आमतौर पर जन्म के तुरंत बाद कुछ सप्ताह बाद बूस्टर के साथ दिया जाता है। यह वायरस के खिलाफ लगभग 100% सुरक्षा प्रदान करता है।
हेपेटाइटिस बी को टीके से रोका जा सकता है। सभी शिशुओं को जन्म के बाद जितनी जल्दी हो सके (24 घंटे के भीतर) हेपेटाइटिस बी का टीका लगवाना चाहिए। इसके बाद कम से कम चार सप्ताह के अंतराल पर हेपेटाइटिस बी के टीके की दो या तीन खुराकें दी जाती हैं।
बूस्टर टीके आमतौर पर उन लोगों के लिए आवश्यक नहीं होते हैं जिन्होंने तीन-खुराक टीकाकरण श्रृंखला पूरी कर ली है। टीका कम से कम 20 वर्षों तक और संभवतः जीवन भर हेपेटाइटिस बी से बचाता है।
 

हेपेटाइटिस बी वैक्सीन की कीमत

आमतौर पर हेपेटाइटिस बी वैक्सीन की कीमत बाजार में 1000 रुपये से 3000 रूपये के बीच विभिन्न ब्रांड नाम से उपलब्ध हैं।


हेपेटाइटिस बी ठीक होता है कि नहीं?

                       या
हेपेटाइटिस बी कितना खतरनाक है?
                       या
हेपेटाइटिस बी का इलाज संभव है या नहीं?

WHO के अनुसार अधिकांश लोग जो हेपेटाइटिस बी का इलाज शुरू करते हैं उन्हें इसे जीवन भर जारी रखना पड़ता हैं। कम आय वाले क्षेत्रों में लिवर कैंसर से पीड़ित अधिकांश लोग निदान के कुछ महीनों के भीतर मर जाते हैं। उच्च आय वाले देशों में मरीज़ बीमारी के दौरान पहले ही अस्पताल पहुंच जाते हैं और उन्हें सर्जरी और कीमोथेरेपी की सुविधा मिलती है, जो जीवन को कई महीनों से लेकर कुछ वर्षों तक बढ़ा सकती है। उच्च आय वाले देशों में कभी-कभी सिरोसिस या लीवर कैंसर से पीड़ित लोगों में लीवर प्रत्यारोपण का उपयोग किया जाता है, जिसकी सफलता अलग-अलग होती है।


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रविवार, जुलाई 30

आई फ्लू (eye flu) या कंजंक्टिवाइटिस

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कंजंक्टिवाइटिस या आई फ्लू क्या है? (what is eye flu)

आई फ्लू (eye flu) जिसे मेडिकल भाषा में कंजंक्टिवाइटिस (conjunctivitis) और सामान्य भाषा में पिंक आई (pink eye) के नाम से जानते है, आँख का इनफ्लामेशन या इन्फेक्शन है। इसके तहत आंख की उस झिल्ली में संक्रमण होता है, जो आंख को ढक कर रखती है। इसे कंजंक्टिवा कहते है। कंजंक्टिवा पतला स्पष्ट ऊतक है जो आंख के सफेद हिस्से पर स्थित होता है और पलक के अंदर की रेखा बनाता है।

आई फ्लू जो धूल कण, एलजी, बैक्टीरिया या वायरस जैसे संक्रामक एजेंट के संपर्क में आने से होता है। जिसके कारण आंखों के सफेद हिस्से में संक्रमण तेजी से फैलता है। एलर्जिक कंजक्टिवाइटिस संक्रामक नहीं होता है। वहीं वायरस जनित तेजी से दूसरों में फैलता है।
conjunctivitis, eye flu,

खुजली, लालिमा और आंख से चिपचिपा तरल निकलना इसके शुरुआती लक्षण है। संक्रमण गंभीर होने से आंखों में सूजन, दर्द व हल्के बुखार के लक्षण भी देखने को मिलते हैं।

आई फ्लू (eye flu) किसी भी उम्र के व्यक्ति में देखने को मिल सकता है लेकिन बच्चो में स्वयं द्वारा साफ सफाई के आभाव में ये दुसरे बच्चो में तेजी से फैलता है।


आई फ्लू के कारण (eye flu Causes)

  • वायरस (virus)
  • जीवाणु (bacteria)
  • कवक (fungus)
  • परजीवी (parasite)
  • शैंपू, गंदगी, धुआं
  • एलर्जी (पराग कण, धूल या धुएं जैसी चीज़ों से)
  • आँख पर पानी के तेज बहाव
  • आँख पर चोट

आई फ्लू के लक्षण (eye flu symptoms)

  • आंखों का लाल होना
  • आँखों में सुजन
  • आँखों में दर्द
  • आँखों से पानी आना
  • आंख में कुछ खटकना
  • आँखों से गाढ़ा पीला स्राव आना
  • आंख रगड़ने की इच्छा होना
  • आँखों में खुजली और
  • आँखों में जलन

आई फ्लू होने पर क्या करें?

  1. आंखों को साफ पानी से क्लीन करें। हाथों को साबुन और पानी से हर थोड़े अंतराल पर धोते रहें। किसी भी संक्रमण से बचने का यह प्रभावी तरीका है।
  2. अपनी आँखों से किसी भी तरह के स्राव को दिन में कई बार ताज़ी रुई या कागज़ के तौलिये से धोएं। इसके लिए साफ और सूती कपड़े का इस्तेमाल करें। पोंछने के लिए टिश्यू का भी प्रयोग कर सकते है।
  3. पीड़ित व्यक्ति काला चश्मा पहनकर रखे, जब तक आपकी आंख ठीक न हो जाए।
  4. जब तक संक्रमण दूर न हो जाए, तब तक अपने तकिए का कवर हर दिन धोएं या बदलें।
  5. यदि आप डिस्पोजेबल लेंस का प्रयोग कर रहे है तो डिस्पोजेबल लेंस को फेंक दें या लंबे समय तक पहनने वाले लेंस और सभी आईवियर केस को साफ करना सुनिश्चित करें।
  6. आखों में दर्द है और लगातार पपड़ी बन रही है तो सुबह उठने पर बंद आंख पर गर्म सिकाई करें।
  7. नेत्र चिकित्सक की सलाह पर आई ड्रॉप सीमित उपयोग करें। डॉक्टर द्वारा बताए गए आई ड्रॉप ही डालें। आई ड्रॉप ऐसा चुनें, जिसमें किसी तरह का प्रीजर्वेटिव का इस्तेमाल न किया गया हो। कुछ लोग स्वयं से स्टेरॉएड्स युक्त आई ड्रॉप ले लेते हैं, जो सही नहीं। आई ड्रॉप डालते समय सावधानी बरतें।
  8. आई ड्रॉप सिर को पीछे की और रखकर डालें। ताकि निर्धारित मात्रा आखी मे चली जाए।
  9. कृत्रिम आसू का उपयोग कर सकते है। आंखो को चिकनाई देने वाली आई ड्रॉप आमतौर पर कंजक्टिवाइटिस से जुड़ी जलन और सूखापन से राहत देती है।
  10. लक्षण गंभीर होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाए।


आई फ्लू होने पर क्या न करें?

  1. टीवी या मोबाइल देखने से बचें।
  2. आंखों को बार-बार छूने से बचें।
  3. आंखों को साफ करने के लिए गंदे कपड़े का इस्तेमाल न करें।
  4. आंखों को छूने के बाद साबुन से हाथ धोना न भूलें।
  5. किसी से भी आई टू आई कांटेक्ट न बनाएं।
  6. तौलिया या रूमाल न साझा करें।
  7. प्रभावित व्यक्ति को आंख छूने के बाद अन्य सामान छूने से रोकें।
  8. अपनी संक्रमित आंख को अपनी उंगलियों से न छुएं या रगड़ें नहीं।
  9. आंखों का मेकअप, आई ड्रॉप या कॉन्टैक्ट लेंस न पहनें और न ही कभी साझा करें।
  10. आई ड्रॉप बोतल की नोक को ना छुए।
  11. खुद से दवा न करे।
  12. आई फ्लू के घरेलू उपचार से बचें। इससे आँख में आराम के बजाय नुकसान हो सकता है।
  13. डॉक्टर द्वारा निर्धारित न की गई कोई भी अन्य चीज आखों में न डालें। जैसे-आँख में किसी प्रकार के काजल, सुरमा, घी जैसी चीजों का इस्तेमाल नहीं करे।
  14. आंखों को रगड़ने से बचे आंखों को अनावश्यक छूए नहीं आंखों को बार- बार रगड़ना और गंदे हाथों से छूना दर्द को बढ़ा देता है।
  15. तौलिया व मेकअप प्रोडक्ट संक्रमित व्यक्ति की चीजें शेयर न करें।
  16. कॉन्टैक्ट लेंस की सफाई संक्रमण के दौरान लैस न पहने।

आई फ्लू या कंजंक्टिवाइटिस का इलाज (eye flu treatment)

अधिकतर मामलों में आई फ्लू के लिए किसी विशेष इलाज की आवश्यकता नहीं होती हैं। यह 2-4 दिन में स्वयं ठीक हो जाता हैं। बशर्ते आप ऊपर बताई गई बातों को फॉलो करें। इसके साथ ही आंखों को साफ रखने के लिए किसी प्लैन आई ड्रॉप का सीमित मात्रा में उपयोग जरूर करें।
नेत्र चिकित्सक की सलाह पर आई ड्रॉप सीमित उपयोग करें।


आई फ्लू से बचने के उपाय

  • प्रभावित व्यक्ति से दूरी बनाए रखें।
  • आँखों को साफ रखने के लिए अपने हाथों को नियमित रूप से साबुन से धोएं। अपने हाथ अक्सर साबुन और गर्म पानी से धोएं।
  • अपनी आँखें साफ़ रखें।
  • कुछ दिनों तक भीड़-भाड वाले इलाकों में जाने से बचें और यदि आवश्यक हो तो चश्मा पहनकर निकले।
  • आँखों को छूने से बचें। अपनी आँखों को बिना साफ हाथों से न छूए या रगड़ें।
  • हाथों पर अल्कोहल आधारित सैनिटाइज़र का उपयोग करे।
  • अगर आपको आई फ्लू के लक्षण हों तो उन्हें साफ और ठंडे पानी से धोएं।
  • बाहर से आने के बाद आंख साफ पानी से धोएं।

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मंगलवार, जुलाई 18

प्लेटलेट्स बढ़ाने वाले फल

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प्लेटलेट्स हमारे खून में पाए जाने वाली रक्त एक कोशिका होती हैं जो चोट लगने पर बहते रक्त को रोकने के लिए थक्का बनने में सहायता करती हैं। डेंगू , मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों में प्लेटलेट्स की संख्या बड़ी तेजी से घटती है। यदि इनकी घटती संख्या को नियंत्रित न किया जाए तो स्थित गंभीर हो सकती है।

एक स्वस्थ व्यक्ति में प्लेटलेट्स की नार्मल रेंज डेढ़ लाख से पांच लाख प्लेटलेट्स एक माइक्रोलीटर रक्त में होनी चाहिए। यदि इनकी संख्या एक लाख से कम होती है तो ऐसा माना जाता है कि प्लेटलेट्स की संख्या कम हो गई है। इस समय कुछ फलों का सेवन प्लेटलेट्स की संख्या को गिरने से रोक सकते हैं और प्लेटलेट्स की संख्या को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

ऐसे ही हम पांच फलों के बारे में बात करेंगे जो आपके प्लेटलेट्स की कमी में प्लेटलेट्स बढ़ाने वाले फल के रूप में मददगार साबित हो सकते हैं।

चुकंदर (beetroot)

चुकंदर प्राकृतिक एंटीऑक्‍सीडेंट और हेमोस्टैटिक गुणों से भरपूर होता है। अगर दो से तीन चम्मच चुकंदर के रस को एक गिलास गाजर के रस में मिलाकर पिया जाये तो ब्लड प्लेटलेट्स तेजी से बढ़ते हैं।

पालक (Spinach)

दो कप पानी में 4 से 5 ताजा पालक के पत्तों को डालकर कुछ मिनट के लिए उबाल लें। इसे ठंडा होने के लिए रख दें। फिर इसमें आधा गिलास टमाटर मिला दें। इसे मिश्रण को दिन में तीन बार पिएं। इसके अलावा आप पालक का सेवन सूप, सलाद, स्‍मूदी या सब्‍जी के रूप में भी कर सकते हैं।

कीवी (Kiwifruit)

कीवी रंग रूप और आकार में चीकू जैसा फल होता है किंतु गुण बिल्कुल हटकर होते हैं। कीवी को काटकर छीलकर उपयोग में लिया जा सकता है। दिन में दो-तीन कीवी का सेवन कुछ ही दिनों में आपके कम प्लेटलेट्स कांउन्ट को सामान्य स्थिति में लाने में बहुत मददगार साबित हो सकता हैं।

पपीता (Papaya)

पपीते के फल और पत्तियां दोनों ही प्‍लेटलेट्स बढ़ाने में मददगार हैं। पपीते के फलों का सेवन या ज्यूस को ले सकते हैं। पपीते के पत्तो को पीसकर छानकर कम कम मात्रा में लिया जा सकता हैं। आप चाहें तो पपीते की पत्तियों को चाय की तरह भी पानी में उबालकर पी सकते हैं।

गिलोय (Giloy)

गिलोय का जूस प्‍लेटलेट्स को बढ़ाने का सर्वोत्तम उपाय है। गिलोय के दो इंच टुकड़े को पानी में उबालकर या गिलोय की डंडी को रात भर पानी में भिगो कर सुबह उसका छना हुआ पानी पी लें। ब्‍लड में प्‍लेटलेट्स बढ़ने लगेंगे।

नारियल पानी (coconut water)

वैसे तो नारियल पानी को किसी भी मरीज या स्वस्थ व्यक्ति को दिया जा सकता हैं किंतु कम प्लेटलेट्स काउंट में नारियल बहुत ज्यादा उपयोगी साबित हुआ है। नारियल इलेक्ट्रोलाइट्स ओर मिनिरल्स का अच्छा स्रोत होता हैं जो शरीर में ब्लड प्लेटलेट्स की कमी को पूरा करने में मदद करते हैं।


मिश्रित ज्यूस (mixed juice) 

अंत में एक फल नहीं बल्कि 5 फलों का मिश्रण होते हैं जिसमे गाजर, पालक, टमाटर, चुकंदर ओर आंवला का ज्यूस बनाकर पिया जा सकता हैं। यदि ज्यूस निकलने की व्यवस्था न हो तो सलाद के रूप में दिन में 3-4 बार सेवन किया जा सकता हैं।
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सोमवार, जुलाई 17

टेस्टोस्टेरोन हार्मोन क्या है? (testosterone level)

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टेस्टोस्टेरोन क्या है (what is testosterone)

एक पुरूष के जननांगों में एक शिशन, वृषणकोष में दो वृषण, एपिडीडिमिस, वास डिफेरेंस, सीमाइनल वेसिकल, बल्बोंयुरेथ्रल ग्रंथि, प्रोस्टेट ग्रंथि और काउपर ग्रंथि को शामिल किया जाता हैं।

पुरुषों में जनन ग्रंथि के रूप में वृषण (Testis) वह स्थान हैं, जहां पर टेस्टोस्टेरोन हार्मोन (testosterone hormone) बनता हैं। दरअसल वृषण (Testis) में अन्तराली कोशिकाएं (interstitial cells) या लैंडिंग कोशिकाएं (Leydig cells) होती हैं जो नर हार्मोन टेस्टोस्टेरोन (testosterone) को स्त्रावित करती हैं जबकि सेमिनिफेरुस ट्यूबल शुक्रजनन (spermatogenesis) द्वारा वीर्य के शुक्राणुओं (sperms) का निर्माण करती हैं।

एक व्यक्ति जब यौवनावस्था में प्रवेश करता है तो टेस्टोस्टेरोन हार्मोन (testosterone hormone) की मदद से वृषण में शुक्राणु का उत्पादन शुरू होता है।
टेस्टोस्टेरोन हार्मोन एक व्यक्ति में ना केवल लैंगिक विकास के लिए बल्कि शारीरिक विकास में भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।

टेस्टोस्टेरोन हार्मोन (testosterone hormone) स्वतंत्र रूप से या प्लाज्मा प्रोटीन के साथ बाइंड हो सकता हैं। स्वतंत्र रूप से पाए जाने वाले टेस्टोस्टेरोन हार्मोन को फ्री टेस्टोस्टेरोन (free testosterone)
कहा जाता हैं।

टेस्टोस्टेरोन के लाभ (function of testosterone)

किशोरावस्था में इस हॉर्मोन के प्रभाव से पुरुषों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (secondary sexual characters) जैसे दाढ़ी मूँछ का आना, स्वर भारी ओर मोटा होना आदि दिखाई देते हैं।

टेस्टोस्टेरोन शारीरिक विशेषताओं जैसे मांसपेशियों की ताकत और विकास, पुरुषों के सेक्सुअल ऑर्गनस का विकास, चेहरे और शरीर के बालों के विकास, ग्रोथ और रखरखाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

एक प्राकृतिक हार्मोन के रूप में अपनी भूमिका के अलावा टेस्टोस्टेरोन का उपयोग पुरुषों में हाइपोगोनाडिज्म (hypogonadism) और महिलाओं में स्तन कैंसर के उपचार में एक दवा के रूप में किया जाता है।

महिलाओं में भी इसकी कुछ मात्रा पाई जाती हैं जो कुछ हद तक महिलाओं के अंडाशय द्वारा स्रावित होता है।
लेकिन अधिक मात्रा से महिलाओं में भी पुरुषों के समान लक्षण दिखाई देने लग जाते हैं- जैसे दाढ़ी मूँछ का आना, स्वर भारी और मोटा होना आदि।

इस हॉर्मोन की कमी से द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास, ग्रोथ और लैंगिक अंगों का विकास अवरुद्ध हो जाता हैं।

टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन किशोरावस्था में बढ़ना शुरू होता हैं और उम्र के साथ साथ घटता जाता हैं। चूंकि पुरुषों की उम्र के रूप में टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम हो जाता है, इस कमी का मुकाबला करने के लिए कभी-कभी वृद्ध पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का उपयोग किया जाता है।


टेस्टोस्टेरोन लेवल कितना होना चाहिए (testosterone normal range या testosterone levels)

एक सामान्य व्यक्ति में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन नॉर्मल रेंज में होना चाहिए। तो आइए जानते हैं कि टेस्टोस्टेरोन लेवल कितना होना चाहिए? सबसे पहले देखते हैं कि महिलाओं में फ्री टेस्टोस्टेरोन का नार्मल रेंज क्या होता है।
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महिलाओं में टेस्टोस्टेरोन का नार्मल रेंज (testosterone in females)

menopause के पहले की महिलाओं में फ्री टेस्टोस्टेरोन का नार्मल रेंज 

0.8 - 9.2 pg/mL 

होता हैं जबकि menopause के बाद - 

0.6 - 6.7 pg/mL 

होता हैं। इसी प्रकार मादा बच्चों में उम्र के अनुसार फ्री टेस्टोस्टेरोन लेवल इस प्रकार होता है।

1-6 वर्ष            0.1 – 0.6 pg/mL

7-9 वर्ष             0.1 – 1.6 pg/mL

10-11वर्ष          0.1 – 2.9 pg/mL


पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन लेवल (testosterone levels in men)

पुरुषों में फ्री टेस्टोस्टेरोन (free testosterone) का लेवल 10-17 उम्र के व्यक्तियों में 

0.6-159 pg/ml 

और 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में 

44-244 pg/ml 

होना चाहिए।

पुरुषों में टोटल टेस्टोस्टेरोन का मान उम्र के अनुसार अलग अलग होता हैं। किशोरावस्था में टेस्टोस्टेरोन का मान बढ़ना शुरू होता हैं और प्रौढ़ावस्था के बाद घटना शुरू हो जाता हैं।

पुरुषों में उम्र के अनुसार टेस्टोस्टेरोन हार्मोन नॉर्मल रेंज इस प्रकार है।

Age

Testosterone normal range

Premature (26-28W)

59-125 ng/dl

Premature (31-35W)

37-198 ng/dl

Newborn

75-400ng/dl

1 week

20-50 ng/dl

2nd months

60-400 ng/dl

7th months-puberty

3-19 ng/dl

7-9 years

0-8 ng/dl

10-11 y

1-48 ng/dl

12-13 y

5-619 ng/dl

14 -15 y

100-320 ng/dl

16-19 y

200-970 ng/dl

20-39 y

400-1080 ng/dl

40-59 y

350-890 ng/dl

60 y+

350-720 ng/dl




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रविवार, जुलाई 16

हेपेटाइटिस (hepatitis in hindi)

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1. पीलिया का निदान (Diagnosis of Jaundice)

पीलिया बढ़े हुए सीरम बिलीरुबिन का शारीरिक संकेत है। चिकित्सकीय रूप से जब सीरम बिलीरुबिन का स्तर 2 mg/dl से अधिक हो जाता है तो इसे पीलिया कहा जाता है। पीलिया की पहचान कुछ शारीरिक लक्षणों और जाँच के आधार पर किया जाता है जिसके निम्न चरण है।

चरण 1 : शारीरिक परीक्षण (Physical examination)

पीलिया का मूल्यांकन और इतिहास शारीरिक परीक्षण से शुरू होता है जिसमें स्किन, नाख़ून, आँखों की जाँच और यूरिन एवं मल के कलर की जाँच शामिल है।

चरण 2 : रक्त जाँच (Lab Tests)

पीलिया का अंदाजा मरीज के शारीरिक परीक्षण से लगा सकते है लेकिन रक्त की आवश्यक है जिसमे डायरेक्ट और इनडायरेक्ट बिलीरुबिन की मात्रा से निर्णय करना होता है कि बिलीरुबिन का स्तर कितना बढ़ा हुआ है। इसके अलावा निम्नलिखित टेस्ट की भी आवश्यकता होती है जो लीवर की वर्तमान स्थिति को बताते है।
सीबीसी (CBC)
एलेनिन एमिनोट्रांस्फरेज़ (ALT) या (SGPT)
एस्पार्टेट एमिनोट्रांस्फरेज़ (AST) या (SGOT)
एल्कलाइन फॉस्फेट (ALP)
गामा-ग्लूटामाइल ट्रांसपेप्टिडेज़ (GGT)
प्रोथ्रोम्बिन समय (PT INR)
एल्ब्यूमिन (Albumin)
मूत्र में बिलीरुबिन (Urine Bilirubin)

चरण 3 : सोनोग्राफी या सीटी स्कैन

लैब टेस्ट से किसी निष्कर्ष के अभाव में अगले चरण में अल्ट्रासाउंड सोनोग्राफी (USG) या कंप्यूटेड टोमोग्राफी (सीटी स्कैन) द्वारा पेट की इमेजिंग शामिल है। यह एक्स्ट्राहेपेटिक ऑब्सट्रक्टिव और इंट्राहेपेटिक पैरेन्काइमल विकारों के बीच अंतर करने में मदद करता है। पित्त नली के फैलाव के लिए यूएसजी उपयोगी है क्योंकि यह यकृत पैरेन्काइमा (सिरोसिस, ट्यूमर, स्टीटोसिस या कंजेशन) के मूल्यांकन के साथ-साथ रुकावट के स्थान (90% रोगियों में) और पित्त पथरी का अधिक सटीक निदान करने में मदद करता है। डायग्नोसिस रोग की प्रीहेपेटिक, हेपेटिक या पोस्ट-हेपेटिक कंडीशन के आधार पर किया जा सकता है।

हेपेटाइटिस (Hepatitis)


पीलिया के कारण

1. प्री-हेपेटिक कारण (Pre-hepatic causes) :

  • ऑटोइम्यून/दवा के कारण लाल रक्त कोशिकाओ का टूटना
  • G6PD की कमी
  • सीसा विषाक्तता (Lead poisoning)
  • दवाएं (जैसे-रिफ़ैम्पिन, आइसोनियाज़िड, प्रोबेनेसिड, एसिटामिनोफेन)
  • रेडियोग्राफिक कंट्रास्ट एजेंट)
  • Pernicious, सिकल सेल या सीडरोब्लास्टिक एनीमिया
  • स्फेरोसाइटोसिस (Spherocytosis)
  • थैलेसीमिया (Thalassemia)

2. हेपेटिक कारण (Hepatic causes) :

तीव्र वायरल या अल्कोहलिक या ऑटोइम्यून या दवा-प्रेरित हेपेटाइटिस (Acute viral or alcoholic or autoimmune or drug-induced hepatitis)
  • रक्तवर्णकता (Hemochromatosis)
  • हिपेटोसेलुलर कार्सिनोमा (Hepatocellular carcinoma)
  • लिवर सिरोसिस और लिवर फैलियर (Liver cirrhosis and failure)
  • प्राथमिक पित्त सिरोसिस (Primary biliary cirrhosis)
  • स्क्लेरोज़िंग पित्तवाहिनीशोथ (Sclerosing cholangitis)
  • स्टीटोहैपेटाइटिस (Steatohepatitis)
  • विल्सन की बीमारी (Wilson's disease)

3. पोस्ट-हेपेटिक कारण: (Post-hepatic causes) :

  • सौम्य पित्त सख्ती (Benign biliary stricture)
  • कोलेंजियोकार्सिनोमा (Cholangiocarcinoma)
  • कोलेडोकल सिस्ट (Choledochal cysts)
  • कोलेडोकोलिथियासिस (Choledocholithiasis)
  • क्रोनिक अग्नाशयशोथ (Chronic pancreatitis)

वायरल हेपेटाइटिस के लक्षण

संक्रामक हेपेटाइटिस की नैदानिक ​​प्रस्तुति व्यक्ति के साथ-साथ विशिष्ट प्रेरक वायरस के आधार पर भिन्न होती है। कुछ मरीज़ पूरी तरह से लक्षणहीन हो सकते हैं या प्रस्तुति में केवल हल्के लक्षण वाले हो सकते हैं। अन्य में फुलमिनेंट हेपेटिक विफलता (एफएचएफ) की तीव्र शुरुआत हो सकती है। संक्रामक हेपेटाइटिस की क्लासिक प्रस्तुति में निम्नलिखित चार चरण शामिल हैं:

चरण 1  (वायरल प्रतिकृति चरण)  
कोई संकेत और लक्षण नहीं।

चरण 2 (प्रोड्रोमल चरण) 
एनोरेक्सिया, मतली, उल्टी, स्वाद में बदलाव। गठिया, अस्वस्थता, थकान, पित्ती, और खुजली और कुछ को सिगरेट के धुएं से घृणा हो जाती है।

चरण 3 (आइक्टेरिक चरण) 
गहरे रंग का मूत्र, हल्के रंग का मल। गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल लक्षण, अस्वस्थता, इक्टेरस दाहिने ऊपरी चतुर्थांश में दर्द, हेपेटोमेगाली।

चरण 4 (स्वास्थ्य लाभ चरण)
लक्षणों और पीलिया का समाधान।

हेपेटाइटिस के जोखिम कारक 

  1. खराब स्वच्छता और खराब स्वच्छता।
  2. दूषित जल/भोजन का सेवन।
  3. एकाधिक यौन साथी।
  4. सीरिंज, टैटू और त्वचा छेदना साझा करना।
  5. अत्यधिक शराब का सेवन।
  6. पहले से मौजूद यकृत रोग की उपस्थिति।

    

हेपेटाइटिस का प्रकार

जोखिम कारक

 

वायरल हेपेटाइटिस


संक्रमित वातावरण में असुरक्षित पानी
कम स्वच्छता
तीव्र हेपेटाइटिस ए संक्रमण से पीड़ित यौन साथी
मनोरंजक दवाओं का उपयोग
समलैंगिकों
ऊंचे क्षेत्रों में टीकाकरण के बिना यात्रा करना

अल्कॉहोलिक हेपेटाइटिस

जेनेटिक कारक
मोटापा
हेपेटाइटिस सी
रक्तवर्णकता

कुपोषण


दवा-प्रेरित हेपेटाइटिस (Drug-induced hepatitis)

दवा संबंधी: खुराक चयापचय
आनुवंशिक प्रवृतियां
लिंग
जीर्ण जिगर की बीमारी































एब्नॉर्मल लिवर फ़ंक्शन टेस्ट की व्याख्या

जब रोगियों में अस्पष्ट या गैर-विशिष्ट लक्षण होते हैं तो लिवर फ़ंक्शन टेस्ट में लगभग 20% रोगियों में रिपोर्ट एब्नॉर्मल मिल सकती हैं। लेकिन लिवर फ़ंक्शन टेस्ट्स की व्याख्या करना एक चुनौती हो सकती है क्योंकि:
1. कुछ यकृत रोग में भी परिणाम सामान्य या सामान्य के करीब हो सकते हैं।
2. असामान्य होने पर, असामान्यता की डिग्री रोग की गंभीरता को प्रतिबिंबित नहीं कर सकती है।
3. लिवर की कोई महत्वपूर्ण बीमारी न होने पर भी परिणाम असामान्य हो सकते हैं। जब भी लिवर फ़ंक्शन टेस्ट असामान्य होते हैं तो डायग्नोसिस से पहले प्रासंगिक कारकों पर विचार किया जाना चाहिए।

हेपेटाइटिस के निदान के लिए मार्कर

लिवर फ़ंक्शन टेस्ट में सीरम अल्कलाइन फॉस्फेट (ALP), एलेनिन एमिनोट्रांस्फरेज़ (ALT), एस्पार्टेट एमिनोट्रांस्फरेज़ (AST) और टोटल बिलीरुबिन के स्तर को मापना शामिल है। इन मार्करों का उपयोग वायरल हेपेटाइटिस के लिए सहायक निदान के रूप में किया जा सकता है। लक्षणयुक्त रोगियों में इन सभी के स्तर आमतौर पर बढ़े हुए होते हैं।

असामान्य स्तर का महत्व:

1. SGOT/SGPT

SGOT को AST और SGPT को ALT भी कह सकते है। SGPT की तुलना में SGOT लीवर के लिए अधिक विशिष्ट है क्योंकि यह केवल लीवर में पाया जाता है जबकि SGOT कंकाल और हृदय की मांसपेशियों, गुर्दे और लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी) में पाया जा सकता है। एक्यूट लिवर इंजुरी में AST का स्तर ALT से अधिक तुरंत बढ़ जाता है।
सीरम एमिनोट्रांस्फरेज़ में हल्की वृद्धि (सामान्य से 5 गुना अधिक) को नीचे दी गई किसी भी स्थिति की उपस्थिति के रूप में समझा जा सकता है:-

 

A. जब SGPT > SGOT हो

B. जब SGOT > SGPT हो

1. क्रोनिक वायरल हेपेटाइटिस
2. एक्यूट वायरल हेपेटाइटिस (A-E, EBV, CMV)
3. NAFLD
4. ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस

1. शराब से संबंधित लीवर इंजरी
(SGOT: SGPT > 2:1)
2. अल्कोहलिक सिरोसिस



सीरम एमिनोट्रांस्फरेज में उल्लेखनीय वृद्धि (सामान्य से 15 गुना अधिक) निम्न स्थितियों में देखी जाती है।
  • एक्यूट वायरल हेपेटाइटिस (ए-ई, हर्पीस),
  • ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस,
  • विल्सन रोग,
  • पित्त नली में रुकावट,
  • एक्यूट बड-चियारी सिंड्रोम (acute Budd-Chiri syndrome)
  • हेपेटिक धमनी लीगेशन (hepatic artery ligation)
वायरल हेपेटाइटिस और दवा-प्रेरित हेपेटाइटिस (drug-induced hepatitis) में SGOT और SGPT का स्तर लगातार बढ़ता है और 7-14 दिनों के भीतर निम्न से हजारों रेंज में चरम पर पहुंच जाता है।

2. एल्केलाइन फ़ॉस्फ़टेज़ (ALP)

एल्केलाइन फ़ॉस्फ़टेज़ का मुख्य स्रोत यकृत और हड्डी है। हालांकि यह आंत और प्लेसेंटा में भी मौजूद होता है। गर्भावस्था (तीसरी तिमाही) और किसी biliary obstruction के दौरान एल्केलाइन फ़ॉस्फ़टेज़ बढ़ जाता है।
हेपेटिक स्थितियों में एल्केलाइन फ़ॉस्फ़टेज़ मामूली रूप से बढ़ा हुआ या सामान्य होता है, जिससे यकृत रोग को biliary dysfunction से अलग करने में मदद मिलती है।

3. बिलीरुबिन (Bilirubin)

  • एक्यूट वायरल और अल्कोहलिक हेपेटाइटिस में बिलीरुबिन सामान्य से 5-10 गुना बढ़ जाता है। (अल्कोहल हेपेटाइटिस में यह सामान्य से 10 गुना अधिक हो सकता है)
  • इस्केमिक हेपेटाइटिस में यह सामान्य से <5 गुना है।
  • उच्च बिलीरुबिन स्तर सभी प्रकार के हेपेटाइटिस में पाया जाता है लेकिन उच्चता की सीमा भिन्न होती है।
  • अल्कोहॉलिक हेपेटाइटिस में टोटल बिलीरुबिन सामान्य से 5-10 गुना बढ़ सकता है। 
  • गंभीर अल्कोहलिक हेपेटाइटिस को 10-15 mg/dl से अधिक बिलीरुबिन स्तर द्वारा चिह्नित किया जाता है।
  • दवा-प्रेरित हेपेटाइटिस में, बिलीरुबिन में वृद्धि सामान्य से 2 गुना अधिक होती है। 
  • एक्यूट वायरल हेपेटाइटिस में, बिलीरुबिन में सामान्य से 5-10 गुना वृद्धि होती है।

4. SGOT/SGPT का अनुपात

  • एल्कोहलिक हेपेटाइटिस में, SGOT> SGPT, जिसका अनुपात 2:1.1 तक पहुंच जाता है।
  • एक्यूट वायरल हेपेटाइटिस मे ALT > AST
  • एक्यूट अल्कोहलिक हेपेटाइटिस में, सीरम SGOT कभी भी 500 U/L से अधिक नहीं होता है और सीरम SGPT 300 U/L से अधिक नहीं होता है।
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